बिंदु का दायरा – लेखिका विनिता बक्शी
समीक्षक : डॉ दौलत राम शर्मा, प्रवक्ता, अलीगढ़ पब्लिक स्कूल, अलीगढ़

बिंदु का दायरा
लेखिका विनिता बक्शी का लघु उपन्यास ‘बिंदु का दायरा’ जहाँ एक ओर दायरे में जीते मनुष्य की कथा, जहाँ सुरक्षा और स्वतंत्रता के बीच का द्वंद दर्शाता है, तो दूसरी और समाज में हो रहे शोषण का वीभत्स रूप प्रकट करता है। यह उपन्यास वर्तमान समय में बहुत प्रासंगिक है। समकालीन समाज में प्रवासन सुरक्षा और शोषण केवल सामाजिक मुद्दों मुद्दे नहीं रह गए हैं, बल्कि वह मनुष्य के अस्तित्व और पहचान से जुड़े गहरे प्रश्न बन चुके हैं। ‘बिंदु का दायरा’ इन्हीं प्रश्नों को एक संवेदनशील और विचारशील कथा के माध्यम से समाज के सामने रखता है। यह उपन्यास किसी एक वर्ग या लिंग की कहानी न होकर मनुष्य की साझा पीड़ा और संघर्ष का दस्तावेज है। कहानी की पात्र बिंदु कहानी के केंद्र में है। एक ऐसी स्त्री जो अपने चारों ओर बने दायरे के भीतर जी रही है।यह दायरा केवल सामाजिक या पारिवारिक नहीं, बल्कि मानसिक और भावनात्मक भी है। उपन्यास का मूल प्रश्न यही है की सुरक्षा के नाम पर बनाए गए ये दायरे कब हमारी संभावनाओं को सीमित करने लगते हैं, क्या हर दायरा बड़ा है या कभी-कभी वही नई संभावनाओं की शुरुआत भी बन सकता है ?

लेखिका विनिता बक्शी प्रवासन और मानव तस्करी जैसे गंभीर विषयों को अत्यंत संयम और संवेदना के साथ प्रस्तुत करती हैं। यहाँ शोर आरोप या अतिनाटकीयता नहीं है। कथा धीरे-धीरे आगे बढ़ती है और पाठक को भीतर तक छूती है। बिंदु का संघर्ष केवल बाहरी परिस्थितियों से नहीं बल्कि भीतर चल रहे द्वंद,भय, आशा आत्मसम्मान से भी है।
इस उपन्यास की विशेषता यह है कि यह लैंगिक असमानता की सीमाओं में बंधा नहीं रहता । यह स्त्री और पुरुष दोनों के अलग-अलग संघर्षों को सामान मानवीय दृष्टि से देखता है। पात्र किसी वैचारिक घोषणा का माध्यम नहीं बनते, बल्कि अपने अनुभवों के साथ जीवंत दिखाई देते हैं। भाषा सरल, प्रवाहपूर्ण और प्रतीकात्मक है। ‘बिंदु’ का ‘दायरा’ जैसे शब्द कथा में दर्शन का रूप लेते हैं। लेखक न तो उपदेश देता है और न ही निर्णय थोपता है,वल प्रश्न उठता है जिनका उत्तर स्वयं पाठक खोजना है। यही इस उपन्यास की साहित्यिक शक्ति है। बिंदु का दायरा आज के समय की एक महत्वपूर्ण कृति है। यह हमें यह सोचने पर विवश करती है कि हम जिन सीमाओं को सुरक्षा मानते हैं, कहीं वे हमारे भीतर की स्वतंत्रता को तो नहीं बांध रही। यह उपन्यासों पाठकों के लिए विशेष रूप से महत्वपूर्ण है जो साहित्य में केवल मनोरंजन नहीं बल्कि समाज और मनुष्य की गहरी समझ तलाशते हैं।

समीक्षक : डॉ दौलत राम शर्मा, प्रवक्ता, अलीगढ़ पब्लिक स्कूल, अलीगढ़
