मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ का समर्थन किया; राष्ट्रीय सद्भाव के लिए आपस में  अंतरधार्मिक बहुसंख्यकों की भावनाओं का सम्मान आवश्यक है: मुस्लिम फ़ोरम

नई दिल्ली, 2 जून: फ़ोरम फ़ॉर मुस्लिम स्टडीज़ एंड एनालिसिस (मुस्लिम फ़ोरम) ने मंगलवार को उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की पवित्र गाय की सुरक्षा के मुद्दे पर की गई टिप्पणियों का स्वागत किया है। फ़ोरम ने कहा कि इस बहस को राजनीतिक टकराव के बजाय सांस्कृतिक संवेदनशीलता और आपसी सम्मान की नज़र से देखा जाना चाहिए।

बिजनौर में एक जनसभा को संबोधित करते हुए  योगी आदित्यनाथ ने कहा कि हिंदुओं के लिए गाय माँ के समान पूजनीय है, इसलिए उसकी स्थिति को स्थापित करने के लिए किसी सरकारी घोषणा की आवश्यकता नहीं है। उनकी यह टिप्पणी कुछ धर्मगुरुओं और सार्वजनिक जीवन से जुड़े प्रतिनिधि लोगों के उन बयानों के बाद आई है, जिनमें गाय को राष्ट्रीय पशु घोषित करने की माँग को लेकर हाल ही में चर्चाएँ आरंभ हुई थीं।

इन घटनाक्रमों पर प्रतिक्रिया देते हुए, फ़ोरम फ़ॉर मुस्लिम स्टडीज़ एंड एनालिसिस के अध्यक्ष प्रो. जसीम मोहम्मद ने कहा कि राजनीतिक रूप से प्रेरित कुछ लोगों का एक तबका असली सामाजिक सद्भाव के बजाय पब्लिसिटी और राजनीतिक संदेश देने के लिए संवेदनशील धार्मिक बहसों में घुसने की लगातार कोशिश कर रहा है। उन्होंने कहा, “भारत की ताक़त सभी समुदायों के पवित्र प्रतीकों का सम्मान करने में निहित है। दुर्भाग्य से, कुछ लोग लाखों लोगों के लिए संवेदनशील मुद्दों के भावनात्मक महत्व को जानते हुए भी उन्हें बार-बार उठाते हैं। ऐसी प्रतीकात्मक राजनीति न तो मुसलमानों का भला करती है और न ही राष्ट्रीय सद्भाव में योगदान देती है।”

मुस्लिम फ़ोरम का मानना है कि हिंदू सभ्यता में ‘गौ-माता’ के प्रति श्रद्धा का एक विशेष स्थान है, और भारत जैसे विविध देश में इस सचाई को स्वीकार करना कोई विवाद का विषय नहीं होना चाहिए।

मुस्लिम फ़ोरम के अनुसार, योगी आदित्यनाथ की टिप्पणियाँ भारतीय समाज के एक बड़े तबके की उस भावना को दर्शाती हैं कि राजनीतिक मतभेदों के बावजूद सांस्कृतिक और धार्मिक परंपराओं का सम्मान किया जाना चाहिए। संगठन ने कहा कि कुछ समूहों द्वारा आस्था से जुड़े मुद्दों को राजनीतिक विवादों में बदलने की कोशिशों के कारण सार्वजनिक चर्चाएँ तेज़ी से ध्रुवीकृत होती जा रही हैं।

मुस्लिम फ़ोरम के अध्यक्ष प्रो. जसीम मोहम्मद ने आगे कहा कि आम भारतीय मुसलमान ऐतिहासिक रूप से अलग-अलग धर्मों के समुदायों के साथ मिलकर रहते आए हैं और उन्होंने आम तौर पर एक-दूसरे की मान्यताओं और परंपराओं का सम्मान करने के महत्व को समझा और स्वीकार किया है। उन्होंने कहा, “भारत का भविष्य धार्मिक संवेदनशीलता को लेकर होड़ करने पर नहीं, बल्कि आपसी पहचान और सम्मान पर निर्भर करता है। ज़िम्मेदार नेतृत्व का काम तनाव को कम करना होता है, न कि उसे बढ़ावा देने का काम करना।” मुस्लिम फोरम ने इस बात पर भी ज़ोर दिया कि धर्म से जुड़ी चर्चाएँ समझदारी और ज़िम्मेदारी के साथ की जानी चाहिए, विशेषकर ऐसे समय में जब सोशल मीडिया अक्सर विवादों और बँटवारे को और बढ़ा देता है।

फोरम फॉर मुस्लिम स्टडीज़ एंड एनालिसिस ने सभी समुदायों के धार्मिक नेताओं, बुद्धिजीवियों और राजनेताओं से अपील की कि वे बातचीत, संयम और लोगों की गहरी आस्थाओं के प्रति सम्मान को बढ़ावा दें। फोरम ने कहा कि भारत की सभ्यतागत शक्ति हमेशा से ही परस्पर मिल-जुलकर रहने पर आधारित रही है और यही सिद्धांत आगे भी हमारी सार्वजनिक चर्चाओं का मार्गदर्शन करता रहे, यही श्रेयस्कर है।

इस नजरिए से मुस्लिम फोरम ने यह निष्कर्ष निकाला कि आस्था और पहचान से जुड़ी राष्ट्रीय चर्चाओं के केंद्र में सांस्कृतिक मूल्य, आपसी सौहार्द और सम्मान, सामाजिक सद्भाव और संवैधानिक मूल्य सदैव बने रहने चाहिए। इसी में हमारे समाज की प्रगति सुनिश्चित हो सकती है।

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