उर्दू को ज़िंदगी में शामिल कीजिए, महज़ भाषा नहीं एक तहज़ीब है – जावेद रहमानी

नई दिल्ली । सायबान उर्दू और जर्नलिज़म टुडे हिंदी अखबार के ग्रुप एडिटर-इन-चीफ जावेद रहमानी उर्दू पत्रकारिता का जाना-पहचाना नाम हैं। उन्होंने सिर्फ पत्रकारिता नहीं की, बल्कि पत्रकारिता को एक वैचारिक आंदोलन का रूप भी दिया।
उनकी लेखनी, उनकी नज़र और उनकी प्रतिबद्धता ने उन्हें उर्दू मीडिया जगत में एक विशिष्ट पहचान दिलाई है।

 

उनका संबंध एक साहित्यिक और पत्रकार परिवार से है, उनके पिता अतीक मुजफ्फरपुरी उर्दू पत्रकारिता के स्तंभ माने जाते थे। अतीक साहब की लेखनी सामयिक विषयों पर होता था, लेकिन भाषा में एक तहज़ीब की ख़ुशबू होती थी। उसी विरासत को जावेद रहमानी आज के डिजिटल दौर में नई उड़ान दे रहे हैं।

जावेद रहमानी का मानना है कि उर्दू केवल एक ज़बान नहीं है, बल्कि एक सोच, एक रवैया, एक तहज़ीब का नाम है। उन्होंने न केवल लेख लिखे, बल्कि उर्दू पत्रकारों की नई पीढ़ी को प्रशिक्षित भी किया। सायबान और जर्नलिज़म टुडे के ज़रिए उन्होंने एक ऐसा मंच खड़ा किया जहाँ उर्दू की गरिमा के साथ आधुनिक विषयों पर विमर्श होता है। जावेद रहमानी का कहना है, उर्दू को सिर्फ अतीत का अफ़साना नहीं बनने देंगे। ये आज की ज़रूरत है, कल की ज़रूरत है और हमारी पहचान भी।

 

प्रश्न : आपको क्या लगता है कि उर्दू भाषा पिछड़ क्यों रही है?
उत्तर : सबसे बड़ी वजह है कि हमने इसे अपनी रोज़मर्रा की भाषा से दूर कर दिया है। उर्दू अब घर की नहीं, महफिल की भाषा बनकर रह गई है। स्कूलों में इसे वैकल्पिक विषय बना दिया गया है, और अभिभावक भी इसे ‘भविष्यहीन’ समझते हैं। जब तक हम खुद इसे अपने व्यवहार और पेशे से नहीं जोड़ेंगे, तब तक सरकार से या किसी नीति से कोई बदलाव नहीं आएगा।

प्रश्न : नई पीढ़ी के लिए उर्दू को प्रासंगिक कैसे बनाया जाए?
उत्तर : हमें उर्दू को तकनीक से जोड़ना होगा। ऐप्स, ई-बुक्स, ऑडियोबुक्स, यूट्यूब, सोशल मीडिया ये सब अब उर्दू के माध्यम बन सकते हैं। हम उर्दू में पॉडकास्ट, वीडियो रिपोर्टिंग और डिजिटल कंटेंट को बढ़ावा देकर हम युवाओं को जोड़ रहे हैं। साथ ही, रोज़गार की संभावनाएँ भी दिखानी होंगी, वरना सिर्फ भाषाई प्रेम से बच्चे इसे नहीं अपनाएँगे।

 

प्रश्न : क्या उर्दू अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ रही है?
उत्तर : उर्दू को बचाने के लिए सिर्फ सरकार की नीतियाँ नहीं, लोगों का जज़्बा ज़रूरी है।
“एक बार सोचिए, वे कहते हैं, “अगर माएं अपने बच्चों को उर्दू लोरी गाना बंद कर दें, तो ये ज़बान कैसे बचेगी? हम उर्दू को सिर्फ अदबी भाषा ना बनाएं, इसे घर, गली और गाड़ी में भी ज़िंदा रखें।

प्रश्न : उर्दू भाषा के लिए आपका मिशन?
उत्तर : सायबान के माध्यम से उर्दू पत्रकारिता को जन-जन तक पहुँचाना, नई पीढ़ी को प्रशिक्षित करना पत्रकारिता कार्यशालाओं और ऑनलाइन कोर्सों के माध्यम से। उर्दू को डिजिटल मीडिया से जोड़ना वेबसाइट, ऐप, पॉडकास्ट, और वीडियो रिपोर्टिंग। अनुवाद कार्यों में उर्दू को बढ़ावा देना, जिससे रोजगार भी सृजित हो। उर्दू शिक्षकों और पाठकों को नेटवर्क से जोड़ना — जिससे एक सक्रिय समुदाय बन सके।

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