“ रहीम का काव्य भारतीय समाज और संस्कृति की साझा परंपरा का जीवंत दस्तावेज़ है”- प्रो. शंभुनाथ तिवारी
जामिया मिल्लिया इस्लामिया के हिन्दी विभाग द्वारा महाकवि रहीम पर राष्ट्रीय संगोष्ठी!

नई दिल्ली : “भारत की संस्कृति का आधार उसकी बहुलता और सह-अस्तित्व की भावना है। यहाँ धर्म, जाति, भाषा, और जीवन-दर्शन के अनेक रूप हैं, जो परस्पर विरोध के बजाय समरसता में विकसित हुए हैं। इसी सांस्कृतिक परंपरा में अब्दुर्रहीम ख़ानख़ाना का काव्य भारतीय जीवनदर्शन का उत्कृष्ट उदाहरण है। वे एक गहरे सांस्कृतिक द्रष्टा और संवेदनशील कवि भी थे। उन्होंने फ़ारसी, अरबी, संस्कृत और हिंदी भाषाओं की गहरी समझ से एक ऐसा साहित्यिक सेतु रचा जो समाज, संस्कृति और धर्म के बीच पुल का कार्य करता है। रहीम का काव्य भारतीय संस्कृति की उस गहरी अंतर्धारा का प्रतिनिधि है, जिसने भक्ति, सूफी और लोक-संवेदनाओं को एक साझा मानवीय धरातल पर जोड़ा। उनका काव्य केवल साहित्यिक रचना नहीं, बल्कि भारतीय समाज की सांस्कृतिक समन्वय परंपरा का जीवंत साक्ष्य है।” ये महत्वपूर्ण विचार अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी के हिंदी विभाग के वरिष्ठ प्रोफेसर शंभुनाथ तिवारी ने जामिया मिल्लिया इस्लामिया के हिंदी विभाग द्वारा आयोजित राष्ट्रीय सेमिनार में मुख्यवक्ता के रूप में बोल रहे थे।
उन्होंने कहा कि रहीम, तुलसी, कबीर और सूर के समान ही धर्म, नीति, प्रेम और मानवीय संबंधों को अपने दोहों में इस तरह पिरोया कि वह आज भी भारतीय जीवनमूल्यों की पहचान बने हुए हैं। उनका काव्य भारतीय समाज और संस्कृति की साझा आत्मा का दस्तावेज़ है। उन्होंने अपनी कविता में धर्म, जाति, वर्ग और भाषा के विभाजन से ऊपर उठकर मानवता, नीति, प्रेम और मर्यादा के शाश्वत मूल्यों को स्थापित किया। रहीम का काव्य यह सिखाता है कि संस्कृति केवल पूजा-पद्धति या परंपरा का नाम नहीं, बल्कि वह जीवन का आचरण है, जो सबको जोड़ता है।”
शंभुनाथ तिवारी ने आगे कहा कि रहीम के काव्य में लोकजीवन की सहजता भी है। वे किसान, गृहस्थ, स्त्री, परिवार—सभी के जीवन से सीख लेकर नीति का सूत्र गढ़ते हैं।
उनकी भाषा में ब्रज और खड़ी बोली का सरल मिश्रण है, जो भारतीय लोकभाषा की आत्मा को व्यक्त करता है।
रहीम के विचारों में धर्म का आधार मानवता है। वे हिंदू या मुसलमान के खाँचों में नहीं बँधे। उनके काव्य में यह उदारता और सार्वभौमिक दृष्टि दिखाई देती है। यह दृष्टि भारतीय धर्मनिरपेक्षता की उस परंपरा को व्यक्त करती है जो ‘योग्यता’ और ‘कार्य’ को धर्म या पद से ऊपर रखती है। रहीम का काव्य भक्ति आंदोलन और सूफी परंपरा, दोनों से प्रभावित है।
रहीम का काव्य समाज के विविध वर्गों की संवेदनाओं से जुड़ा हुआ है। वे राजा और प्रजा, धनवान और निर्धन, सभी के जीवन-मूल्यों पर समान दृष्टि रखते हैं। रहीम का जीवन भारत की गंगा-जमुनी तहज़ीब का साक्षात उदाहरण है—जहाँ इस्लामी रूहानियत और भारतीय अध्यात्म एक साथ साँस लेते हैं।
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हिंदी विभाग के अध्यक्ष प्रो. नीरज कुमार के निदेशन तथा प्रो. चंद्रदेव यादव के संयोजन में आयोजित संगोष्ठी में देश के अनेक प्रतिष्ठित विश्वविद्यालयों के आचार्य सम्मिलित हुए, जिनमें प्रो. हरिमोहन शर्मा एवं प्रो. अनिल राय( दिल्ली विश्वविद्यालय), प्रो. वशिष्ठ द्विवेदी अनूप काशी हिंदू विश्वविद्यालय, प्रो. शंभुनाथ तिवारी, श्री अजय बिसारिया अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी के नाम प्रमुखता से उल्लेखनीय हैं।
कार्यक्रम में हिंदी विभाग के संकाय सदस्यों प्रो. दुर्गाप्रसाद गुप्त, प्रो. हेमलता महिश्वर, प्रो. इंदु विरेंदर, प्रो. दिलीप शाक्य, प्रो. कहकशाँ साद, प्रो. अजय नावरिया, डॉ. विवेक दुबे, डॉ. अनिलकुमार, डॉ. मुकेश मिरोठा, डॉक्टर दीबा नियाज़ी सहित बड़ी संख्या में शोधार्थियों की उपस्थिति संगोष्ठी की गंभीरता, उपादेयता एवं प्रासंगिकता को प्रदर्शित करती है।
