TRE-4 में पारंपरिक भाषाओं के साथ न्याय हो, रोस्टर की पुनर्समीक्षा करे बिहार सरकार: शिबली मंज़ूर

दिल्ली/पटना: भागलपुर निवासी, अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय (AMU) के पूर्व छात्र नेता तथा अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी (AICC) अल्पसंख्यक विभाग के राष्ट्रीय सचिव एवं दिल्ली प्रदेश कांग्रेस अल्पसंख्यक विभाग के प्रभारी शिबली मंज़ूर ने बिहार सरकार से आग्रह किया है कि TRE-4 शिक्षक भर्ती के विषयवार रोस्टर की तत्काल समीक्षा कर फारसी, अरबी, मैथिली, पाली, भोजपुरी सहित सभी पारंपरिक भाषाओं के लिए पर्याप्त शिक्षक पद सुनिश्चित किए जाएं।

उन्होंने कहा कि पिछले लगभग दो वर्षों से इन विषयों के हजारों STET-2025 उत्तीर्ण अभ्यर्थी नियुक्ति की प्रतीक्षा कर रहे हैं। ऐसे समय में पारंपरिक भाषाओं के लिए अत्यंत सीमित रिक्तियां निर्धारित करना न केवल योग्य अभ्यर्थियों के साथ अन्याय है, बल्कि हमारी समृद्ध भाषाई और सांस्कृतिक विरासत के प्रति भी उदासीनता का परिचायक है।

शिबली मंज़ूर ने कहा कि बिहार भगवान बुद्ध की कर्मभूमि है, मिथिला भारतीय संस्कृति की पहचान है और फारसी व अरबी सदियों से भारत के इतिहास, साहित्य, प्रशासन, न्यायिक अभिलेखों तथा गंगा-जमुनी तहज़ीब का अभिन्न हिस्सा रही हैं। इन भाषाओं का संरक्षण किसी एक वर्ग का नहीं, बल्कि पूरे राष्ट्र की साझा जिम्मेदारी है।

उन्होंने शिक्षक स्थानांतरण प्रक्रिया में फारसी और अरबी शिक्षकों के संबंध में उठी चिंताओं का उल्लेख करते हुए कहा कि सभी विषयों के शिक्षकों और अभ्यर्थियों के साथ समान, पारदर्शी और न्यायपूर्ण व्यवहार सुनिश्चित किया जाना चाहिए।

शिबली मंज़ूर ने बिहार सरकार से मांग की कि TRE-4 के विषयवार रोस्टर की पुनर्समीक्षा कर पारंपरिक भाषाओं के लिए पर्याप्त रिक्तियां सुनिश्चित की जाएं, स्वीकृत एवं रिक्त पदों का वास्तविक विवरण सार्वजनिक किया जाए तथा STET-2025 उत्तीर्ण अभ्यर्थियों की शीघ्र, पारदर्शी और निष्पक्ष नियुक्ति की जाए।

उन्होंने कहा, “भाषाएं केवल संवाद का माध्यम नहीं होतीं, वे हमारी सभ्यता, इतिहास और सांस्कृतिक स्मृति की संवाहक होती हैं। यदि विद्यालयों से पारंपरिक भाषाएं कमजोर होंगी, तो आने वाली पीढ़ियां अपनी बहुमूल्य विरासत से दूर होती चली जाएंगी। इसलिए इन भाषाओं का संरक्षण और इनके शिक्षकों की नियुक्ति राष्ट्रीय दायित्व के रूप में देखी जानी चाहिए।”

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