एएमयू के प्रोफेसर एम. जे. वारसी ने भाषा के माध्यम से लिंग पहचान की सामाजिक समझ को किया उजागर

नई दिल्ली : अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय के भाषाविज्ञान विभाग के पूर्व विभागाध्यक्ष और लिंग्विस्टिक सोसायटी ऑफ इंडिया के अध्यक्ष, प्रो. एम. जे. वारसी ने केरल केंद्रीय विश्वविद्यालय के भाषाविज्ञान विभाग के तत्वाधान में “भाषा और लिंगः एक संक्षिप्त दृष्टिकोण” विषय पर आमंत्रित व्याख्यान प्रस्तुत किया।

प्रो. वारसी ने बताया कि भाषा किस प्रकार लिंग आधारित भूमिकाओं को मजबूत करती है और समाज में लिंग पहचान को आकारदेने में भूमिका निभाती है। उन्होंने कहा कि शक्ति, भावना, अधिकार या कोमलता से जुड़े शब्द अक्सर लिंग आधारित अर्थों को छिपाए रहते हैं, जो पारंपरिक अपेक्षाओं को प्रोत्साहित करते हैं।

उन्होंने बताया कि 1970 के दशक से अनुप्रयुक्त भाषाविज्ञान और समाज भाषाविज्ञान में लिंग को लेकर शोध में काफीविकास हुआ है। पहले शोध इस बात पर केंद्रित थे कि किस तरह भाषा में पावर की असमानता झलकती है और महिलाओं से सम्बंधित मामलों को कैसे एक विशेष प्रकार की बोलचाल में ढाला जाता है। बाद में शोध का दायरा बढ़ा और यह लिंग पहचान व समाज के बीच के संबंधों को भी शामिल करने लगा।

प्रो. वारसी ने यह भी बताया कि संवाद की शैली पर सामाजिक मानदंडों का गहरा असर होता है। उन्होंने रॉबिन लैकोफ के 1975 के शोध का हवाला देते हुए बताया कि महिलाओं की भाषा में शिष्टाचार, प्रश्नसूचक टैग, अनिश्चितता और तीव्रता जैसे विशेष गुण अधिक दिखाई देते हैं, जो सामाजिक अपेक्षाओं को दर्शाते हैं।

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