प्रार्थना है ! एम.पी. उलट जाए, सुनते ही चौंक उठे थे अटल जी — राम महेश मिश्र

लोकसभा चुनाव का दौर था। भारतीय जनता पार्टी की लखनऊ शाखा के जिम्मेदार व्यक्तियों ने हमसे संपर्क किया कि माननीय अटल जी की एक सभा गायत्री परिवार द्वारा आयोजित करा दें। हमने संस्था की मर्यादाएं और अनुशासन बताए कि संस्था ऐसा नहीं कर सकती। लेकिन एक रास्ता निकाला, वह यह कि चुनावी दौरे के बीच माननीय अटल बिहारी वाजपेई गायत्री शक्तिपीठ पर माता गायत्री और पावन गुरुसत्ता को प्रणाम करने पधारें। आरती का समय हो तो और अच्छा। वैसा ही हुआ। मौन साधक की भूमिका में हमने संयोजन किया, भारतीय परिधान अर्थात धोती कुर्ता पहने लोकसभा सांसद श्री अटल जी आए, लखनऊ गायत्री परिवार के लगभग 200 कार्यकर्ता कुर्सी रोड स्थित श्री गायत्री शक्तिपीठ पर मौजूद थे। सभा का समन्वयन हमारे द्वारा किया गया। हमारे मुख से निकला- मां भगवती गायत्री से हमारी प्रार्थना है कि एम.पी. उलट जाए। पूरी सभा चौंक उठी। लोगों को लगा, राम महेश जी की जुबान फिसल गई है। मध्य में भूमि पर पालथी लगाए बैठे आदरणीय बाजपेई जी ने हमारी ओर देखा और मुस्कुरा दिए। पल भर के लिए चौंके वह भी थे, लेकिन तत्क्षण वह समझ गए, मैं क्या कहना चाह रहा हूं। उनके मुस्कुराने के बाद कुछ पल सन्न बैठी सभा के भाव में भी बदलाव आया और सब मुस्कुरा उठे, जोरदार तालियां बजीं। गायत्री माता की जय, परम पूज्य गुरुदेव की जय, वंदनीय माताजी की जय, के नारों से सभागार गूंज उठा। सबके प्रिय अटल जी न केवल लखनऊ लोकसभा निर्वाचन क्षेत्र से भारी मतों से विजई हुए, बल्कि एम.पी. उलटकर पी.एम. बन गया। याद है, वह अटल जी की 13 दिनों वाली सरकार थी। बाद में तो उन्होंने पूरे समय इस विशाल राष्ट्र का सशक्त एवं अद्भुत नेतृत्व किया।
श्री अटल बिहारी वाजपेई वास्तव में अद्भुत पुरुष थे, महापुरुष थे, उन्हें युगपुरुष कहने में भी अतिशयोक्ति नहीं होगी। सभी को लेकर चलने की उनकी क्षमता बेजोड़ थी। बड़ी से बड़ी समस्या का निदान किसी गीत की पंक्ति, किसी मुहावरे या आशु रचना के माध्यम से मुस्कुराते हुए कर देना उनकी बड़ी कला थी। याद है, एक बार उनके सांसद प्रतिनिधि श्री लाल जी टंडन (जो उन दिनों उत्तर प्रदेश के नगर विकास एवं आवास मंत्री थे तथा कालांतर में मध्य प्रदेश के राज्यपाल बने) ने हमें माल एवेन्यू लखनऊ के अति विशिष्ट अतिथि गृह में प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेई के आगमन पर पांच व्यक्तियों के साथ बुलाया था। जब हमने प्रधानमंत्री जी को बताया कि हम पूज्यश्रेष्ठ आचार्य श्रीराम शर्मा जी के शिष्य हैं, तब उनके गंभीर चेहरे पर न केवल मुस्कराहट आई, बल्कि वह खिल उठे। देर तक बातें करते रहे। उस समय वहां श्री लाल जी टंडन के अलावा उत्तर प्रदेश सरकार के वरिष्ठ मंत्री श्री कलराज मिश्र (जो बाद में भारत के एमएसएमई मंत्री तथा राजस्थान के राज्यपाल बने) भी मौजूद थे। वास्तव में विचार विनिमय का उनका तरीका बहुत अद्भुत था।
श्री अटल बिहारी वाजपेई अतिव्यस्तता के दौरान भी सभी से अपने आपको कैसे कनेक्ट कर लेते थे, इसका उदाहरण हमने तब देखा था, जब उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री श्री कल्याण सिंह द्वारा प्रधानमंत्री वाजपेई जी के लखनऊ आगमन पर, माल एवेन्यू स्थित अपने राजकीय आवास पर, दिए गए रात्रिभोज में प्रतीक्षा कर रहे ढेरों अतिथियों के बीच कुछ क्षण के लिए मुख्यमंत्री के साथ उनका आना और विनोदपूर्ण एवं स्नेहभरे लहजे में सभी से आग्रह करना कि मेरे मित्रों! मैं विलंबित हो गया हूं, आप भोजन प्रसाद ग्रहण करें। मान लें, मैं आपके साथ आपकी टेबल पर बैठा हूं। समस्त अतिथि उन पलों में खड़े हो गए थे और उनकी स्नेहभरी बातों को सुनकर न केवल प्रेमादर से लबालब थे, बल्कि सबने तालियों की गड़गड़ाहट से आकाश को गुंजायमान कर दिया था। मेरे पास बैठे किंग जॉर्ज मेडिकल यूनिवर्सिटी (KGMU) के वाइस चांसलर प्रोफेसर महेंद्र भंडारी बोल उठे थे- न भूतो न भविष्यति प्रधानमंत्री। ध्यातव्य हो, गायत्री परिवार के चार अन्य प्रतिनिधियों के साथ हमें भी उस रात्रिभोज में भाग लेने का सौभाग्य प्राप्त हुआ था।
श्री अटल बिहारी वाजपेई के देहावसान के समय हम राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली में थे। बतौर निदेशक हमने विश्व जागृति मिशन के आरती स्थल पर संध्याकाल उपस्थित कई प्रान्तों के साधकों के बीच कीर्तिशेष अटल जी को याद करते हुए कहा था- जाइए अटल जी जाइए! लेकिन आपसे कुछ प्रार्थना है- सब कुछ तो दे ही दिया था इस देश को आपने। अब क्या शेष था देने को। हां! आपसे हमारी अंतिम प्रार्थना यह है कि उस लोक से यह आशीर्वाद अवश्य दीजिएगा कि ऋषि-मुनियों के इस देश की धरा अटल बिहारी जनना बन्द न करे। यहां की माताओं की कोखें इतनी कमजोर न हो जाएं कि इस देश में महापुरुष पैदा होना बन्द हो जाएं। रुंधे गले से हमने आगे कहा था- हे अटल! आशीर्वाद दीजिएगा कि आपकी प्रिय मातृभूमि कभी अकाल का दु:ख न भोगे। अपना आशीष दीजिएगा कि यह धरती दिन दूनी रात चौगुनी उन्नति करे। इस देश की धरती पर गांव, गाय, गंगा, ग्रामदेवता किसान, श्रमिक, ऋषियों और वीरों का सम्मान होता रहे। ऊपर से मंगलकामना कीजिएगा कि यह धरा सदैव हरी-भरी रहे।
श्रद्धेय श्री अटल बिहारी वाजपेई की अंत्येष्टि के समय लिखी गई इन पंक्तियों को, कुछ ही घंटे बाद आहूत उस प्रार्थना सभा में भावविभोर होकर सुन रहे लोगों के बीच हमने कहा था- हे अटल! ऊपर से आशीष दीजिएगा कि आपकी प्रिय मातृभूमि को फिर कभी विभाजन का दंश न झेलना पड़े। इस देश में जातियों और संप्रदायों में दूरी इतनी ज्यादा न बढ़ जाए कि आपकी आत्मसत्ता को वहां भी पीड़ा झेलनी पड़े। प्रभु के आशीष भेजिएगा कि भारत के शीर्ष पुरुषों में ऋषि राष्ट्र की वे सारी खूबियां बरकरार रहें, जिनसे वे आपकी मातृभूमि को वास्तविक उत्कर्ष के पद पर आगे बढ़ाते रह सकें तथा इसकी मर्यादाओं को कभी गिरने न दें। हमने कहा था- और हां! यदि आपको पुनः इस पृथ्वी पर आना पड़े तो इसी देश में आइएगा। संकीर्णता की बाढ़ और चरित्र व नैतिकता के अकाल वाले इस कालखण्ड में यहां आपकी बड़ी आवश्यकता है।
अपनी लेखनी से निकले शब्द सभी को सुनाते हुए हमने कहा था- आपके और हिमालय के परम तपस्वी गायत्रीपुत्र परम पूज्य गुरुदेव ऋषिवर पंडित श्रीराम शर्मा आचार्य के स्वर्णिम युग में भारत भूमि पर जन्म लेना हमारे जीवन की सबसे बड़ी उपलब्धियों में से एक है। इसके लिए अपने स्मृतिशेष माता-पिता का हृदय से आभारी हूं। आज आपकी हस्तलिखित चार पंक्तियां हम सबको भीतर तक कचोट रही हैं। आशीर्वाद दीजिए कि हम सब आपका दर्द बंटाने की दिशा में कुछ खास कर सकें। आपने लिखा था-
सूर्य गिर गया अंधकार में ठोकर खाकर।
भीख मांगता है कुबेर झोली फैलाकर।
कण-कण को मोहताज कर्ण का देश हो गया।
मां का आंचल द्रुपदसुता का केश हो गया।
हमने अन्त में कहा था- जाइए अटल जी! वैचारिक रूप से खण्ड-खण्ड हो चुका भारत आज आपके महाप्रयाण पर आंखों में अश्रु और श्रद्धा से झुके शीश लिए स्थूलत: एक होकर खड़ा है। दल व पार्टी सबसे ऊपर उठकर सबजन आपके जाने से दु:खी हैं। आपकी यह मिट्टी कई सदियों तक आपको अपनी सबसे प्रिय संतान के रूप में सदैव स्मरण रखेगी।
राष्ट्रीय प्रस्तावना मासिक पत्रिका के जिम्मेदारों को साधुवाद देता हूं कि उन्होंने युगपुरुष अटल बिहारी वाजपेई पर विशेषांक प्रकाशित किया। अपनी इस स्वनामधन्य पत्रिका के माध्यम से श्रद्धा के योग्य श्री अटल बिहारी वाजपेई को हमारे शत-शत भाग्योदय नमन।

(लेखक भाग्योदय फाउंडेशन नई दिल्ली के अध्यक्ष तथा राष्ट्रीय प्रस्तावना के आध्यात्मिक संपादक हैं। )
