समकालीन हिंदी उपन्यासों में समय, समाज और संस्कृति का  प्रतिरोधी स्वर सामाजिक यथार्थ को प्रतिबिंबित करता है’- प्रो. शंभुनाथ तिवारी 

अलीगढ़ नवंबर 16, 2025 : भारतीय साहित्य की परंपरा सदैव जीवन के यथार्थ से जुड़ी रही है। कथा-साहित्य, विशेषकर उपन्यास, समाज और संस्कृति का ऐसा दर्पण है, जिसमें समय की धड़कनें और जीवन की जटिलताएँ प्रतिबिंबित होती हैं। हिंदी उपन्यास ने अपने उद्भव से लेकर अब तक अनेक सामाजिक-राजनीतिक और सांस्कृतिक आंदोलनों को स्वर प्रदान किया है। हिंदी उपन्यास अपने प्रतिरोधी स्वरूप में लगातार बदलते समय, समाज और संस्कृति के सवालों से संवाद करता रहा है। यह विचार हिंदी विभाग के वरिष्ठ प्रोफेसर शंभुनाथ तिवारी ने गत दिनों अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग द्वारा आयोजित राष्ट्रीय सेमिनार में अपने संयोजकीय वक्तव्य के रूप में व्यक्त किए! 
प्रो शंभूनाथ तिवारी ने कहा कि  समकालीन हिंदी उपन्यासों की सबसे महत्त्वपूर्ण विशेषता है,  प्रतिरोध की चेतना। यह प्रतिरोध केवल किसी सत्ता या व्यवस्था के विरुद्ध खड़ा होना नहीं है, बल्कि जीवन की असमानताओं, अन्याय, शोषण और हाशिये पर पड़े समुदायों की आवाज़ को केंद्र में लाना भी है। दलित और स्त्री अस्मिता, आदिवासी जीवन, प्रवासी पीड़ा, किसान और श्रमिक संघर्ष, सांस्कृतिक अस्मिता तथा पर्यावरणीय संकट—इन सभी प्रश्नों को आज का उपन्यास गहरी संवेदनशीलता और आलोचनात्मक दृष्टि के साथ प्रस्तुत करता है। इसके साथ ही, समकालीन हिंदी उपन्यास समय के बदलते सांस्कृतिक और सामाजिक परिदृश्य को भी रेखांकित करता है। बाज़ारवाद, उपभोक्तावाद, तकनीकी क्रांति, वैश्वीकरण और बदलते मूल्य-बोध ने जिस प्रकार हमारी संस्कृति और जीवनशैली को प्रभावित किया है, उसका चित्रण इन उपन्यासों में विविध रूपों में दिखाई देता है। यह चित्रण मात्र अनुकरण नहीं, बल्कि प्रश्न उठाने और प्रतिरोध रचने की प्रक्रिया है। आज आवश्यकता है कि हम यह समझें कि उपन्यासकार किस प्रकार से हमारे समय की विसंगतियों को साहित्यिक भाषा में व्यक्त कर रहे हैं और किस तरह समाज में प्रतिरोध की वैचारिक और रचनात्मक भूमि तैयार कर रहे हैं। साहित्य का यही पक्ष इसे मात्र मनोरंजन का साधन न बनाकर सामाजिक परिवर्तन का सशक्त उपकरण बनाता है। 
उन्होंने कहा कि समय तो वस्तुत: एक ही होता है, पर सुविधा के लिए हम उसे अतीत-वर्तमान-भविष्य में बाँट लेते हैं। जिस तरह किसी प्रस्तरखंड को बहुत दूर तक प्रक्षेपित करने के लिए अपने हाथ को बहुत दूर तक ले जाना पड़ता है, एक रचनाकार सुदूर अतीत के घटनाक्रमों को पकड़कर वर्तमान में उन्हें आँकता है, जिससे भविष्य की संभावनाएँ स्पष्ट होती हैं। उक्त संगोष्ष्ठी में हिंदी के अनेक प्रतिष्ठित साहित्यकारों एवं शोधार्थियों ने सहभागिता की।
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