नरेंद्र मोदी शासन के बारह साल: विकसित भारत की राह पर नई ऊर्जा और नवशक्ति का समय ! – प्रोफ़ेसर जसीम मोहम्मद

भारत के यशस्वी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में जैसे-जैसे भारतीय जनता पार्टी की सरकार अपने शासन के बारह साल पूरे कर रही है, यह पुनरवलोकन करना  सही है कि देश आज कहाँ खड़ा है!  एक क्षेत्रीय  विशेष शक्ति के तौर पर भारत ने अपनी चहुँमुखी विकास की दृष्टि से असाधारण प्रगति की है। डिजिटल ट्रांसफ़ॉर्मेशन, वेलफ़ेयर, आर्थिक सुधारों, विदेश नीति आदि विषयों पर अपने दृढ़ निश्चय और तकनीकी नवाचार की दृष्टि से अपनी उपलब्धियों के कारण भारत एक ग्लोबल लीडर के रूप में  उभरा है। हम जानते हैं कि समय के साथ ही आत्मसंतुष्टि प्राप्त होती है। इसलिए यह ज़रूरी है कि हम स्वयं  को समझें और नए सिरे से आगे बढ़ें, क्योंकि देश विकसित भारत बनने की अपनी यात्रा के अगले पड़ाव पर जाने की तैयारी कर रहा है।

भारत ने  स्वयं के एक मज़बूत लोकतंत्र होने पर सदैव गर्व किया है, लेकिन जंतर-मंतर पर हाल के विरोध प्रदर्शन और वोटरों की नई पीढ़ी का भारी मतदान, जो पहले से कहीं ज़्यादा बेहतर तरीक़े से जुड़े हुए और जागरूक हैं, यह इस बात का संकेत है कि देश के युवा विकास की कहानी का हिस्सा बनना चाहते हैं और सार्वजनिक रूप से अपनी बात रखना चाहते हैं। एक आत्मविश्वास से भरा हुआ भारत हमेशा अपने नागरिकों के साथ भाईचारे की भावना से जुड़ेगा और युवा हमेशा देश को  आगे ले जाने में अहम भूमिका निभाएँगे।

प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी ने सन् 2047 तक भारत को एक विकसित  देश बनाने की बात कही है, जो एक ऐसा दूरदर्शी दृष्टिकोण है, जिसने पूरे देश के लोगों को प्रेरित किया है।

वे  जानते और समझते हैं कि भारत ने इस लक्ष्य की ओर शानदार कदम बढ़ाए हैं, लेकिन उसको पूरा करने के लिए मशीनरी में नई जान डालने के लिए नए सिरे से फोकस और एनर्जी की आवश्यकता  है। जैसे-जैसे देश  प्रगति पथ पर  आगे की ओर  बढ़ रहा है, इस उद्देश्य  को पूरा करने के लिए हर संस्थान  को आपसी तालमेल बिठाने की ज़रूरत है। इस दृष्टिकोण  से, मेरा मानना है कि सरकार के अंदर और आम लोगों के साथ सार्थक संचार और संवाद  पर ध्यान केंद्रित करना अत्यंत आवश्यक है।

सरकार के सभी मंत्रालय, थिंक-टैंक, एकेडेमिया, शोधसंस्थान, स्वयंसेवी संगठन  और सिविल सोसाइटी ऑर्गनाइज़ेशन अलग-अलग मंत्रालयों से प्रस्ताव, बातचीत और संवाद  के माध्यम से सुझाव लेकर संपर्क करते हैं। हालाँकि अक्सर, इनमें से कई ईमेल और पत्राचार  का लंबे समय तक कोई जवाब नहीं  मिलता, बावजूद इसके यह ज़रूरी है कि हम हर आउटरीच का जवाब दें, भले ही यह उनके काम के लिए उन्हें धन्यवाद देने या और जानकारी माँगने के लिए हो। इस तरह हम सिविल सोसाइटी के साथ मज़बूत संबंध बनाने और हमारे गवर्नेंस मैकेनिज़्म को अगले लेवल पर ले जाने में सहायता  कर सकते हैं।

सरकार प्रत्येक स्तर पर जनभागीदारी को बढ़ावा दे रही है और इस प्रयास  में, मंत्रालयों को नागरिकों, रिसर्चर्स, एकेडमिक इंस्टीट्यूशन्स और सोशल ऑर्गनाइज़ेशन्स को जवाब देने के लिए असरदार तंत्र विकसित करने होंगे। कई महत्वपूर्ण योजनाएँ सिर्फ़ चर्चा के लिए सही प्लेटफ़ॉर्म की कमी के कारण अधूरी रह जाती हैं। जवाबदेही की संस्कृति न सिर्फ़ पॉलिसी बनाने की क्षमता को बढ़ाएगी, बल्कि सरकार  के प्रति लोगों का भरोसा भी बढ़ाएगी।

पिछले बारह वर्षों  में देखा गया एक और अच्छा बदलाव यह है कि थिंक टैंक, ग़ैरसरकारी संगठन, एकेडेमिया और प्राइवेट एजेंसियों में सम्मिलित होनेवाले मंत्रियों और पब्लिक अथॉरिटीज़ की संख्या में तुलनात्मक रूप से कमी आई है। मौजूदा सरकार के शुरुआती सालों में, कैबिनेट मंत्री और प्रमुख  अक्सर कॉन्फ्रेंस, सेमिनार, सिंपोजियम और डायलॉग में हिस्सा लेते थे। इस तरह की बातचीत ने विचारों को खुलकर सामने लाने के लिए एक बेहतरीन प्लेटफ़ॉर्म दिया और सरकार और समाज के बीच एकजुटता की भावना को बढ़ावा दिया। अब समय आ गया है कि हम सरकारी अधिकारियों में फिर से ऐसा जोश और उत्साह  देखें।

जनता से सार्थक बातचीत और परस्पर संवाद करना सिर्फ़ एक विकल्प नहीं, बल्कि किसी भी सरकार के लिए अनिवार्य है, जो देश की ज़रूरतों के लिए कार्य करते हुए जवाबदेह रहना चाहती है। एंटरप्रेन्योर्स, सोशल वर्कर्स, स्कॉलर्स, स्टूडेंट्स, रिसर्चर्स और एनजीओ के साथ बातचीत करके अलग-अलग राय जानने से एक मंत्री ज़्यादा जानकारीवाली पॉलिसी बना पाएगा। इसी तरह, किसी भी  पॉलिसी बनाने की प्रक्रिया में जनभागीदारी होने से उन्हें अहमियत और सम्मान का अनुभव होगा, जिससे सरकार पर उनका भरोसा और विश्वास बढ़ेगा। इस रूप में  मंत्रियों को लोगों की कठिनाइयों और अपेक्षाओं  के बारे में सीधे जानकारी मिलेगी, जिससे वे ज़्यादा जानकारी और आत्मविश्वास के साथ पॉलिसी को बना पाएँगे।

आगामी बारह सालों में सरकार को उन तमाम  कमियों और अंतराल  को दूर करना होगा, जिन्होंने अब तक भारत की वृद्धि और विकास  में रुकावटें  डाली हैं। लाल फ़ीताशाही, ब्यूरोक्रेटिक देरी और देश की माँगों पर धीमी प्रतिक्रिया ने भारत की प्रगति की राह में असर डाला है, जिसे रोकना होगा। गवर्नेंस एक लगातार चलनेवाला प्रोसेस है, और सरकार को लोगों की बढ़ती माँगों को पूरा करने के लिए अपनी कार्य क्षमता एवं कार्य दक्षता को बेहतर बनाते रहना चाहिए। एक उत्साह और ऊर्जा से भरी हुई सरकार जो अपनी सार्थकता और शक्ति  को समझती है, उसे अपनी कार्य दक्षता  को बेहतर बनाने के लिए खुद को  बेहतर  बनाने और अपनी आलोचना स्वीकार करने के लिए सदैव तैयार रहना चाहिए। अंततः, वर्तमान सरकार की  शक्ति  युवाओं की प्रतिभा का सही इस्तेमाल करने, अपनी बड़े मानव संसाधन का इस्तेमाल करने, और भारत को विकसित भारत बनाने के लिए टेक्नोलॉजी और डिजिटल लिटरेसी को बढ़ावा देने की उसकी योग्यता और नीतियों से पता चलती है।

आज भारत एक रोमांचक मोड़ पर खड़ा है, जहाँ से भारत की युवा आबादी (डेमोग्राफिक डिविडेंड), आर्थिक क्षमता और उभरती वैश्विक पहचान उसे नई ऊँचाइयों पर ले जाएगी और सन् 2047 तक ‘विकसित भारत’ का सपना पूरा करेगी, हालाँकि, तय समय-सीमा तक विकसित देश का दर्जा पाने के लिए विभिन्न स्तरों पर अभी बहुत कुछ किया जाना  बाकी है। मजबूत सरकारी संस्थान, जवाबदेह शासन और नीति-निर्माण की प्रक्रिया में लोगों की भागीदारी भारत की विकासयात्रा के अहम निर्णायक हिस्से हैं। विकास का मतलब सिर्फ़ बड़े प्रोजेक्ट बनाना, डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर तैयार करना और वैश्विक मंच पर भारतीय अर्थव्यवस्था को बढ़ावा देना ही नहीं है, बल्कि विकासयात्रा  में शासन के विभिन्न संस्थानों को व्यवस्थित और विकसित बनाना, लोकतांत्रिक ढाँचे को मजबूत करना और देश के फैसले लेने की प्रक्रिया में जनभागीदारी को बढ़ाना भी शामिल है।

अतीत के  गौरव-गान और पिछले दशक की उपलब्धियों का उत्सव मनाने के लिए बारह साल का समय बहुत कम है।  बजाय इसके, सरकार को इस समय-अंतराल  का उपयोग अपनी छवि को नई दीप्ति, नया रूप देने, अपनी उपलब्धियों को आगे बढ़ाने और देश के प्रति अपनी प्रतिबद्धता को मजबूती से प्रकट करने के लिए करना चाहिए। जैसे-जैसे भारत ‘विकसित भारत’ की दिशा की ओर बढ़ रहा है, सरकार को जनता के साथ बातचीत और सार्थक संवाद का एक मजबूत तंत्र  स्थापित करना चाहिए, लोगों की जायज़ माँगों पर तुरंत ध्यान देना चाहिए, बातचीत को बेहतर बनाना चाहिए और थिंक टैंक, शिक्षा जगत और सामाजिक संगठनों के साथ अपने संबंधों को नई ऊर्जा और नवशक्ति के साथ आगे बढ़ना चाहिए। अगर सरकार अपनी मौजूदा गति, वर्तमान सोच और नीतिगत मूल्यों को बनाए रखते हुए अपनी कमियों को भी दूर कर सके, तो ‘विकसित भारत’ की ओर भारत की यात्रा सचमुच बहुत विशिष्ट, दूरगामी  और अभूतपूर्व होगी।

(लेखक सेंटर फॉर नमो स्टडीज के प्रोफेसर और चेयरमैन हैं। ईमेल: profjasimmd@gmail.com)

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