नवजागरण के प्रभाव में राष्ट्रीयता की भावना हिंदी-उर्दू साहित्य की साझा विरासत है- प्रो. शंभुनाथ तिवारी

नोएडा : “ भारतीय स्वाधीनता आंदोलन केवल राजनीतिक संघर्ष का इतिहास नहीं है, बल्कि यह सांस्कृतिक जागरण, भाषाई चेतना और साहित्यिक पुनरुत्थान की भी गाथा है। जब भारत गुलामी की जंजीरों में जकड़ा हुआ था, तब साहित्य ने जनता को मानसिक, भावनात्मक और वैचारिक बल प्रदान किया। हिंदी, बंगला, तमिल, पंजाबी आदि भाषाओं की भांति उर्दू साहित्य ने भी इस महान संघर्ष में अमूल्य योगदान दिया। उर्दू भाषा भारतीय संस्कृति की गंगा-जमुनी तहज़ीब का प्रतीक है। यह भाषा विभिन्न समुदायों, धर्मों और परंपराओं की साझा धरोहर है। स्वाधीनता आंदोलन में उर्दू साहित्यकारों ने अपनी लेखनी को आंदोलन का हथियार बनाया। कवियों ने जनता में जोश और जज़्बा जगाया, लेखकों ने राष्ट्रीय एकता और स्वतंत्रता की चेतना का प्रसार किया, और पत्रकारों ने औपनिवेशिक शासन के विरुद्ध आवाज़ बुलंद की।” ये विचार अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी के वरिष्ठ प्रोफेसर शंभुनाथ तिवारी ने गौतमबुद्ध विश्वविद्यालय, नोएडा में ‘ भारतीय हिंदी प्राध्यापक परिषद’ के राष्ट्रीय संगोष्ठी में व्यक्त किए।
वरिष्ठ प्रोफेसर शंभुनाथ तिवारी ने कहा कि, 1857 का विद्रोह केवल सैनिक विद्रोह नहीं था, बल्कि एक सांस्कृतिक प्रतिरोध भी था, जहाँ अनेक शायरों -कवियों ने प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से औपनिवेशिक सत्ता के विरुद्ध अपनी असहमति को अभिव्यक्त किया। भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन केवल राजनीतिक संघर्ष नहीं था, बल्कि यह सांस्कृतिक, भाषाई और साहित्यिक जागरण का भी आंदोलन था। इस संघर्ष में भारतीय भाषाओं ने राष्ट्र चेतना को जगाने में गहरी भूमिका निभाई। हिंदी की तरह उर्दू ने भी इस आंदोलन को स्वर, शब्द और विचार प्रदान किए। उर्दू साहित्य केवल एक भाषा का साहित्य नहीं, बल्कि स्वतंत्रता आंदोलन की सांस्कृतिक आत्मा था। यह साहित्य जनता में आज़ादी का जोश जगाने, साम्प्रदायिक सद्भाव को बढ़ावा देने और औपनिवेशिक शासन के विरुद्ध आवाज़ बुलंद करने में अद्वितीय रहा। उर्दू कवियों और लेखकों ने अपनी लेखनी को हथियार बनाकर स्वतंत्रता संग्राम को सांस्कृतिक ऊर्जा दी। उर्दू कविता स्वाधीनता आंदोलन का प्रमुख सांस्कृतिक हथियार थी, जिसके माध्यम से अवाम के दिलों में राष्ट्रीय भावनाओं की ज्योति जलाई गई। उर्दू कविता में राष्ट्रीय भावनाओं की जो अभिव्यक्ति आज़ादी की पहली लड़ाई के परिवेश और उसकी परिस्थितियों में आरंभ हुई थी, देश को आज़ाद होने तक उसकी अनुगूँज लगातार सुनाई पड़ती है।

आज़ादी की लड़ाई में राष्ट्रीय भावनाओं की अभिव्यक्ति और देशप्रेम का जज़्बा पैदा करने की नज़र से एक बड़ा हिस्सा और अहम योगदान तरक्कीपसंद तहरीक का है, जिसने पूरे हिन्दोस्तान में अपने तरीक़े से राष्ट्रीयता और राष्ट्रीय भावनाओं का व्यापक प्रचार और प्रसार किया! इस तहरीक में हालाँकि हिंदी- उर्दू दोनों भाषाओं के रचनाकार शामिल थे, पर उर्दू साहित्य से जुड़े रचनाकारों ने जिस तरह इस तहरीक को शुरू करने और लौंगों को जोड़कर एक व्यापक आंदोलन चलाने का काम किया, वह अभूतपूर्व कहा जा सकता है! उर्दू साहित्य में राष्ट्रीयता की भावना जिस तरह व्यापक स्तर पर व्यक्त हुई है, वह हमारे जातीय साहित्य और हिंदी-उर्दू साहित्य की साझा विरासत है।
