संस्कृत विभाग द्वारा संस्कृत सप्ताह कार्यक्रम का उद्घाटन

नई दिल्ली : जामिया मिल्लिया इस्लामिया, नई दिल्ली के संस्कृत विभाग द्वारा संस्कृत सप्ताह समारोह 2025 के उपलक्ष्य में दिनांक 11 अगस्त 2025 को एक द्विदिवसीय कार्यक्रम का शुभारम्भ हुआ। कार्यक्रम के प्रथम दिन ‘मुखं व्याकरणं स्मृतम्’ विषय पर एक विशिष्ट व्याख्यान का आयोजन किया गया जिसमें मुख्य वक्ता के रूप में दिल्ली विश्वविद्यालय के संस्कृत विभाग के वरिष्ठ आचार्य प्रो. सत्यपाल सिंह, मुख्य अतिथि के रूप में राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसन्धान और प्रशिक्षण परिषद् (NCERT) नई दिल्ली के संस्कृत विभाग के सहायकाचार्य एवं संस्कृत भारती के दिल्ली प्रान्त के मन्त्री डॉ. देवकीनन्दन जी उपस्थित थे। कार्यक्रम की अध्यक्षता जामिया मिल्लिया इस्लामिया के संस्कृत विभाग के अध्यक्ष डॉ. जयप्रकाश नारायण ने की।
श्रावण मास की पूर्णिमा के दिन प्रति वर्ष विश्व संस्कृत दिवस मनाया जाता है। प्रत्येक वर्ष श्रावणपूर्णिमा के तीन दिन पूर्व एवं तीन दिन बाद तक संस्कृत सप्ताह का आयोजन सन् 1969 ई. से सम्पूर्ण भारत में किया जाता रहा है। इस आयोजन के केन्द्र में संस्कृत भाषा होती है जिसके संवर्द्धन एवं परिवर्द्धन हेतु एक सप्ताह पर्यन्त भारत के विविध शैक्षणिक संस्थानों में संस्कृत विषयक विविध कार्यक्रमों के माध्यम से इस भाषा में निहित ज्ञान-विज्ञान का प्रदर्शन किया जाता है।
कार्यक्रम में उपस्थित अतिथियों का अङ्गवस्त्र एवं स्मृति चिह्न से स्वागत किया गया। वाचिक स्वागत करते हुए संस्कृत विभागाध्यक्ष डॉ. जयप्रकाश नारायण ने कहा कि इस वर्ष संस्कृत सप्ताह समारोह के उपलक्ष्य में जामिया के संस्कृत विभाग द्वारा दिनांक 11-12 अगस्त 2025 तक द्विदिवसीय कार्यक्रम का आयोजन किया जा रहा है। जिसमें आज संस्कृत व्याकरण विषयक एक विशिष्ट व्याख्यान का आयोजन किया गया है तथा कल द्वितीय दिवस को संस्कृत विषयक विविध प्रतियोगिताएँ आयोजित की जाएंगी। इस प्रतियोगिता के अन्तर्गत संस्कृत प्रश्नमञ्च, श्लोकगायन, श्लोकपाठ, शब्दार्थस्पर्धा आदि विविध प्रतियोगिताओं का आयोजन सुनिश्चित है जिसमें विभागीय शोधछात्रों एवं स्नातक तथा स्नातकोत्तर के छात्रों द्वारा प्रतिभागिता की जाएगी।
कार्यक्रम के प्रथम दिन आयोजित विशिष्ट व्याख्यान में मुख्य वक्ता के रूप में प्रो. सत्यपाल सिंह ने संस्कृत व्याकरणशास्त्र के स्वरूप, वैशिष्ट्य एवं इसके अध्ययन के अनिवार्यता पर विशद् व्याख्यान दिया। उन्होंने बताया कि भारतीय ज्ञान परम्परा के मूल में वेद हैं और वेदों के अध्ययन के लिए वेदाङ्गों का अध्ययन अपेक्षित होता है। छः वेदाङ्गों में व्याकरण को वेद का मुख कहा गया है। जिस प्रकार मुख से भोजन ग्रहण करने के पश्चात् शरीर के सभी अंगों को पोषण मिलता है, उसी प्रकार व्याकरण के ज्ञान से समस्त वेदों और अन्य शास्त्रों को समझना सरल हो जाता है। किसी भी भाषा के साङ्गोपाङ्ग स्वरूप को समझने के लिए उस भाषा के व्याकरण का ज्ञान होना अत्यन्त आवश्यक होता है। संस्कृत एक ऐसी समृद्ध एवं प्राचीनतम भाषा है जिसका व्याकरण अत्यन्त समृद्ध एवं वैज्ञानिक है। संस्कृत व्याकरण शास्त्र की एक सुदीर्घ परम्परा है जिसमें आचार्यों ने अनेक व्याकरणों का प्रतिपादन किया है। सम्प्रति पठन-पाठन में पाणिनि व्याकरण ही अत्यन्त प्रसिद्ध है। पाणिनि व्याकरण न केवल भारत में बल्कि सम्पूर्ण भारत में प्रसिद्ध है। इस शास्त्र का मूल ग्रन्थ महर्षि पाणिनि के द्वारा विरचित ‘अष्टाध्यायी’ है जिस पर महर्षि कात्यायन के द्वारा वार्तिकों की एवं महर्षि पतञ्जलि के द्वारा महाभाष्य की रचना की गयी है। व्याकरण शास्त्र के अन्य ग्रन्थों में आचार्य भर्तृहरि का वाक्यपदीय नामक ग्रन्थ अत्यन्त प्रसिद्ध है जिसमें भाषाविज्ञान एवं भाषादर्शन का अन्यतम निदर्शन प्राप्त होता है।
मुख्य अतिथि के रूप में बोलते हुए डॉ. देवकीनन्दन ने संस्कृत भाषा की वैज्ञानिकता एवं उपादेयता पर विस्तार से प्रकाश डाला। उन्होंने संस्कृत संभाषण पर विशेष बल दिया तथा छात्रों को प्रेरित किया। उन्होंने यह भी बतलाया कि संस्कृत भाषा एक वैज्ञानिक भाषा है जिसका व्याकरण अत्यंत सुस्पष्ट और वैज्ञानिक है। इसके नियमों की स्पष्टता और तार्किकता इसे कंप्यूटर और आज समग्र विश्व में प्रचलित कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) के लिए एक उपयुक्त भाषा बनाती है। पाणिनि द्वारा विरचित अष्टाध्यायी संस्कृत व्याकरण का एक प्राचीन और अत्यन्त व्यवस्थित ग्रंथ है। विश्व के किसी भी अन्य भाषा का इतना व्यवस्थित व्याकरण देखने को नहीं मिलता है। हम सौभाग्यशाली हैं कि हम संस्कृत भाषा के अध्ययन एवं अध्यापन में संलग्न हैं। संस्कृत भाषा को जाने बिना भारतीय संस्कृति के साङ्गोपाङ्ग स्वरूप को जानना एवं समझना अत्यंत दुष्कर है।
कार्यक्रम का शुभारम्भ अतिथियों द्वारा दीपप्रज्वलन एवं सरस्वती प्रतिमा पर माल्यार्पण से हुआ। प्रारम्भ में विभागीय शोधछात्र श्री करण वशिष्ठ ने वैदिक मङ्गलाचरण एवं शोधच्छात्रा प्रीति ने लौकिक मङ्गलाचरण प्रस्तुत किया। इस कार्यक्रम में 50 से अधिक संस्कृत प्रेमी उपस्थित थे। कार्यक्रम का संचालन विभाग की अतिथि प्राध्यापिका डॉ. सरिता दूबे ने एवं धन्यवाद ज्ञापन डॉ. मणि शंकर द्विवेदी ने किया । इस अवसर पर विभाग के सभी प्राध्यापक, शोधछात्र तथा स्नातकोत्तर एवं स्नातक के सभी विद्यार्थिगण उपस्थित थे।
