दहेज को ना, बारात को विराम; कमसार-ओ-बार के पठानों ने निकाह को बनाया सादगी और सामाजिक सुधार की मिसाल – प्रोफ़ेसर जसीम मोहम्मद
कमसार-ओ-बार के पठान: सामाजिक सुधार की एक ऐतिहासिक मिसाल, अब बारात-मुक्त विवाह की ओर

भारत के सामाजिक इतिहास में कुछ ऐसे उदाहरण मिलते हैं, जहां किसी समुदाय ने अपनी सामूहिक इच्छाशक्ति, संगठन और दूरदर्शिता के बल पर सदियों से चली आ रही सामाजिक कुरीतियों को चुनौती दी और बदलाव की नई इबारत लिखी। उत्तर प्रदेश के गाजीपुर – बिहार के सीमावर्ती क्षेत्रों में बसे कमसार-ओ-बार के पठानों का सामाजिक सुधार आंदोलन ऐसा ही एक प्रेरणादायक उदाहरण है। इस समुदाय ने दहेज प्रथा, विवाह में अनावश्यक खर्च, दिखावे और सामाजिक प्रतिस्पर्धा के विरुद्ध जो अभियान चलाया, वह आज भी भारतीय समाज के लिए अनुकरणीय है।
इस आंदोलन की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि लगभग 1906 से जुड़ती है। देवैथा गांव के हाफ़िज़ सुलेमान खान ने सामाजिक कुरीतियों को समाप्त करने की आवश्यकता महसूस की और इस दिशा में पहल की। उन्होंने उस समय लखनऊ में कार्यरत खान बहादुर मंसूर अली खान से संपर्क किया। वर्ष 1910 में बारा गांव में एक सलाहकार समिति गठित हुई, जिसने विवाह समारोहों में हाथी-घोड़े, अनावश्यक जुलूस, कव्वाली और फिजूलखर्ची को सीमित करने की दिशा में महत्वपूर्ण निर्णय लिए।
आगे चलकर वर्ष 1938 में डिप्टी मोहम्मद सईद खान के नेतृत्व में इस संगठन का औपचारिक पंजीकरण अंजुमन इस्लाह मुस्लिम राजपूत कमसार-ओ-बार के नाम से हुआ। इसका मुख्यालय दिलदारनगर, गाज़ीपुर उत्तर प्रदेश में बनाया गया। इस संगठन ने सामाजिक सुधार को केवल विचार तक सीमित नहीं रखा, बल्कि उसे सामुदायिक अनुशासन और सामूहिक जिम्मेदारी का रूप दिया।
27 अक्टूबर 1985 को गाजीपुर जिले के बारा गांव के महुबाड़ी मैदान में एक ऐतिहासिक सम्मेलन आयोजित हुआ। इसमें लगभग 65 गांवों से 10 हजार से अधिक लोग शामिल हुए। सम्मेलन का उद्देश्य संगठन को पुनर्जीवित करना और उन सामाजिक सुधारों को फिर से प्रभावी बनाना था, जिनका पालन समय के साथ कमजोर पड़ने लगा था। इस सम्मेलन में दहेज के विरुद्ध प्रस्ताव पारित किया गया। विवाह और अन्य सामाजिक आयोजनों में खर्च की सीमा निर्धारित की गई। दोनों पक्षों की ओर से विवाह समारोह में शामिल होने वाले लोगों की संख्या सीमित करने, महंगे उपहारों पर नियंत्रण रखने तथा कव्वाली, नौटंकी और अनावश्यक मनोरंजन कार्यक्रमों को बंद करने जैसे निर्णय लिए गए।
उस दौर में विवाह की भव्यता सामाजिक प्रतिष्ठा का प्रतीक बन चुकी थी। अनेक परिवार अपनी बेटियों की शादी के लिए जमीन तक बेचने या गिरवी रखने को मजबूर होते थे। इस्लाहिया कमेटी के सर्वेक्षण का उल्लेख करते हुए उस समय के सामाजिक कार्यकर्ताओं ने बताया था कि विवाह के खर्चों के कारण हर वर्ष अनेक परिवारों को अपनी जमीन बेचनी पड़ती थी।
समाज ने समझा कि यदि विवाह को प्रतिष्ठा की प्रतिस्पर्धा बना दिया जाएगा तो गरीब और मध्यमवर्गीय परिवार आर्थिक रूप से कमजोर होते जाएंगे। इसलिए सुधार का रास्ता केवल उपदेश नहीं, बल्कि सामूहिक निर्णय और उसके पालन में दिखाई दिया।
आज कमसार-ओ-बार के पठानों के बीच विवाह को और अधिक सादा, गरिमापूर्ण तथा आर्थिक रूप से सहज बनाने की दिशा में बारात न ले जाने का संकल्प एक महत्वपूर्ण सामाजिक पहल के रूप में सामने आया है। यह केवल एक रस्म को छोड़ने का निर्णय नहीं है, बल्कि विवाह की मूल भावना को पुनर्स्थापित करने का प्रयास है।
निकाह इस्लाम धर्म में एक पवित्र सामाजिक और धार्मिक अनुबंध है। उसकी गरिमा का संबंध किसी भव्य बारात, महंगे आयोजन, सैकड़ों मेहमानों या दिखावे से नहीं है। निकाह की वास्तविक खूबसूरती आपसी सहमति, जिम्मेदारी, सम्मान और पारिवारिक संबंधों की मजबूती में निहित है।
कमसार-ओ-बार के समाज में बारात न ले जाने का संकल्प इसी सोच को आगे बढ़ाता है। इसका उद्देश्य विवाह को अनावश्यक खर्चों से मुक्त करना, वर-वधू दोनों परिवारों को आर्थिक दबाव से बचाना और समाज में समानता की भावना को मजबूत करना है।
कमसार ओ बार की ये पहल का एक महत्वपूर्ण सामाजिक राष्ट्रीय संदेश यह भी है कि जब बारात, दिखावे और स्वागत-सत्कार की प्रतिस्पर्धा समाप्त होगी, तब गरीब परिवारों की बेटियों के विवाह में आने वाली आर्थिक बाधाएं कम होंगी। विवाह के नाम पर कर्ज लेने, जमीन बेचने और वर्षों तक आर्थिक बोझ उठाने की प्रवृत्ति पर भी अंकुश लग सकेगा। मैं समझता हूं, बारात न ले जाने का अर्थ विवाह की खुशियों को समाप्त करना नहीं है। इसका अर्थ है खुशियों को अनावश्यक प्रदर्शन से अलग करना। परिवारों के बीच आत्मीयता, निकाह, दुआ, वलीमा और आपसी सम्मान के माध्यम से भी विवाह को यादगार बनाया जा सकता है।
कमसार-ओ-बार के इस आंदोलन की सबसे बड़ी विशेषता यह रही है कि इसमें केवल बुजुर्गों ने नेतृत्व नहीं किया, बल्कि युवाओं ने भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। शिक्षा के प्रसार, मदरसों, विद्यालयों और महाविद्यालयों की स्थापना ने नई पीढ़ी में सामाजिक चेतना पैदा की। यही चेतना पुराने सामाजिक ढांचों में सकारात्मक बदलाव का आधार बनी।
इस्लाहिया कमेटियों ने गांव-गांव में संगठनात्मक व्यवस्था विकसित की। नियमों के उल्लंघन पर सामाजिक स्तर पर जवाबदेही तय की गई। इस आंदोलन का संदेश केवल एक बिरादरी तक सीमित नहीं रहा। उस क्षेत्र के अन्य समुदायों ने भी इसकी सराहना की। यह इस बात का प्रमाण है कि सामाजिक सुधार किसी धर्म या जाति की सीमा में बंधा हुआ विषय नहीं, बल्कि समूचे समाज की आवश्यकता है।
आज आवश्यकता है कि इस ऐतिहासिक विरासत को केवल अतीत की उपलब्धि मानकर न छोड़ा जाए। दहेज के साथ-साथ विवाह में अनावश्यक ख़र्च, कर्ज, दिखावा, सामाजिक दबाव और महिलाओं के सम्मान से जुड़े प्रश्नों पर भी निरंतर काम किया जाए। साथ ही, किसी भी सामाजिक नियम को लागू करते समय परिवारों की गरिमा, महिलाओं की स्वतंत्रता और युवाओं की सहमति का सम्मान सर्वोपरि रहना चाहिए।
मैं मानता हूं, कमसार-ओ-बार के पठानों का यह प्रयास भारतीय समाज में सामुदायिक नेतृत्व और सामाजिक जिम्मेदारी का एक उल्लेखनीय उदाहरण है। यदि कोई समाज स्वयं आगे बढ़कर अपनी गलत परंपराओं की समीक्षा करता है और समय के अनुरूप सकारात्मक परिवर्तन स्वीकार करता है, तो वह आने वाली पीढ़ियों के लिए बेहतर भविष्य का निर्माण करता है।
कमसार-ओ-बार के पठानों का संदेश स्पष्ट है; शादी प्रतिष्ठा का प्रदर्शन नहीं, दो परिवारों के जुड़ने और दो व्यक्तियों के नए जीवन की शुरुआत का पवित्र अवसर है। दहेज से मुक्ति और बारात से परहेज का संकल्प तभी सार्थक होगा, जब इसे सामाजिक चेतना, शिक्षा और आपसी सहमति के साथ आगे बढ़ाया जाएगा।
सच्ची सामाजिक प्रतिष्ठा महंगे आयोजनों में नहीं, बल्कि उस सोच में है जो समाज को आर्थिक बोझ से मुक्त करे, बेटियों को सम्मान दे और आने वाली पीढ़ियों के लिए एक बेहतर सामाजिक व्यवस्था स्थापित करे।
“जब निकाह सादगी से होगा, दहेज समाज से विदा होगा और बारात का दिखावा समाप्त होगा, तभी विवाह संस्कार नहीं, बल्कि सामाजिक समानता और मानवीय गरिमा का उत्सव बनेगा।”

(लेखक तुलनात्मक अध्ययन के प्रोफ़ेसर हैं और उसिया ग्राम विकास शिक्षा एवं सांस्कृतिक न्यास के प्रबंध न्यासी हैं। profjasimmd@gmail.com पर संपर्क किया जा सकता है )
