जन्म शताब्दी वर्ष : गाज़ीपुर की मिट्टी, भारत की रूह : राही मासूम रज़ा की कालजयी विरासत – प्रो. जसीम मोहम्मद

इस भौतिक संसार में दो तरह के लेखक–रचनाकार होते हैं—एक वे जो केवल पुस्तकें लिखकर छोड़ जाते हैं, और दूसरे वे जो अपने लेखन से दुनिया को देखने का एक नया और अलग नज़रिया दे जाते हैं।राही मासूम रज़ा इसी दूसरी श्रेणी के एक लोकप्रिय रचनाकार थे। साहित्य की दुनिया के इस स्वनामधन्य रचनाकार का गाज़ीपुर से होना हम गाज़ीपुर वासियों के लिए सिर्फ एक तथ्य नहीं, बल्कि एक बहुत ही निजी और गौरवशाली अदबी अहसास है। वे केवल एक नाम नहीं, बल्कि एक संस्कृति के रूप में थे जो हमारे बीच से निकलकर पूरे भारत की आवाज़ बन गए।
गंगौली से बॉम्बे तक का सफ़र
राही मासूम रज़ा साहब का जन्म गाज़ीपुर के एक छोटे से गाँव ‘गंगौली‘ में हुआ। आज गंगौली का नाम वैश्विक साहित्य के मानचित्र पर दर्ज है, तो इसका श्रेय राही साहब की कलम को ही जाता है। उन्होंने यह साबित कर दिया कि महानता के लिए महानगरों की चकाचौंध अनिवार्य नहीं है; मिट्टी की सोंधी महक और गाँव की गलियों के अनुभव भी एक विश्वस्तरीय साहित्यकार को जन्म दे सकते हैं। पूर्वी उत्तर प्रदेश के खेतों से शुरू हुआ उनका यह सफ़र अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी की बौद्धिक बहसों से होता हुआ बॉम्बे की फ़िल्मी दुनिया तक पहुँचा, लेकिन उनकी जड़ें हमेशा गंगौली में(कितनी चिड़िया उड़े आकाश/ दाना है धरती के पास) ही जमी रहीं।

गाज़ीपुर का सांस्कृतिक दूत
स्वयं गाज़ीपुर से होने के नाते, मुझे गर्व होता है कि राही मासूम रज़ा हमारे सबसे बड़े सांस्कृतिक दूत थे। जब पूरा देश उनका कालजयी उपन्यास ‘आधा गाँव‘ पढ़ता है या ‘महाभारत‘ धारावाहिक देखता है, तो वे अनजाने में ही हमारे अंचल की भाषा, यहाँ के हास्य और यहाँ के सरोकारों से जुड़ रहे होते हैं। राही जहाँ भी गए, गाज़ीपुर को अपने दिल में बसाकर ले गए। उन्होंने अपनी रचनाओं के माध्यम से एक सच्चे कलाकार की तरह स्थानीयता को वैश्विक पहचान दी।
साहित्य में आम आदमी की धड़कन
