हिंदी के वैश्विक प्रसार के लिए कुलपति प्रो. कुमुद शर्मा को मिला अंतरराष्ट्रीय प्रेमचंद सम्मान

भारतीय-नार्वेजीय सूचना एवं सांस्कृतिक फोरम, नार्वे ने किया सम्मानित

वर्धा, 4 अगस्त 2026: महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय, वर्धा की कुलपति प्रो. कुमुद शर्मा को साहित्य, पत्रकारिता, शिक्षा और हिंदी भाषा के अंतरराष्ट्रीय प्रचार-प्रसार में उनके विशिष्ट एवं बहुआयामी योगदान के लिए ‘अंतरराष्ट्रीय प्रेमचंद सम्मान-2026’ से सम्मानित किया गया है। भारतीय-नार्वेजीय सूचना एवं सांस्कृतिक फोरम, नार्वे ने महान कथाकार मुंशी प्रेमचंद की जयंती के उपलक्ष्य में आयोजित एक कार्यकम में 02 अगस्त 2026 को यह प्रतिष्ठित सम्मान प्रदान किया।
यह सम्मान विश्व स्तर पर हिंदी भाषा, भारतीय साहित्य और सांस्कृतिक मूल्यों के संवर्धन में उल्लेखनीय योगदान देने वाले व्यक्तित्वों को प्रदान किया जाता है। प्रो. कुमुद शर्मा ने शिक्षा, साहित्य, पत्रकारिता और सांस्कृतिक विमर्श के क्षेत्र में अपने दीर्घकालीन कार्यों के माध्यम से हिंदी को वैश्विक पहचान दिलाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। उनके नेतृत्व में महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय ने भारतीय ज्ञान परंपरा, हिंदी भाषा, अनुवाद, शोध, प्रकाशन तथा अंतरराष्ट्रीय अकादमिक सहयोग के क्षेत्र में अनेक उल्लेखनीय पहल की हैं, जिनकी देश-विदेश में सराहना हुई है।
भारतीय-नार्वेजीय सूचना एवं सांस्कृतिक फोरम, नार्वे एक प्रतिष्ठित अंतरराष्ट्रीय सांस्कृतिक संस्था है, जो भारत और नार्वे के साथ-साथ विभिन्न देशों की संस्कृतियों के बीच संवाद और सहयोग को सुदृढ़ करने का कार्य करती है। संस्था भारतीय भाषाओं, साहित्य, कला और संस्कृति को वैश्विक मंच पर प्रतिष्ठित करने तथा विभिन्न देशों के बीच सांस्कृतिक सेतु का निर्माण करने के उद्देश्य से निरंतर सक्रिय है।
फोरम की स्थापना वर्ष 1988 में नार्वे की राजधानी ओस्लो में भारतीय एवं नार्वेजीय लेखकों तथा भारतीय दूतावास के सहयोग से हुई थी। स्थापना के बाद से संस्था साहित्य, संस्कृति, शिक्षा और अंतरराष्ट्रीय संवाद के क्षेत्र में उल्लेखनीय कार्य कर रही है। प्रेमचंद के नाम पर दिया जाने वाला यह सम्मान संस्था के सबसे प्रतिष्ठित अंतरराष्ट्रीय सम्मानों में शामिल माना जाता है।
प्रो. कुमुद शर्मा को यह सम्मान मिलने की सूचना मिलते ही महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय परिसर में हर्ष और गौरव का वातावरण व्याप्त हो गया। विश्वविद्यालय के शिक्षकों, अधिकारियों, कर्मचारियों, शोधार्थियों और विद्यार्थियों ने इसे विश्वविद्यालय ही नहीं, बल्कि हिंदी जगत के लिए भी गौरव का विषय बताया। यह सम्मान इस बात का भी प्रमाण है कि हिंदी आज विश्व पटल पर अपनी सशक्त उपस्थिति दर्ज करा रही है और भारतीय भाषाओं तथा संस्कृति के प्रति अंतरराष्ट्रीय समुदाय की रुचि निरंतर बढ़ रही है।

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