‘हिंदी-उर्दू : प्रवासी भारतीयों के सांस्कृतिक जुड़ाव और उनकी वैश्विक पहचान का माध्यम हैं’ – प्रो. शंभुनाथ तिवारी

सिडनी( आस्ट्रेलिया)। दुनिया के विभिन्न देशों में वर्षों से इंडियन डायसपोरा की पहचान के साथ स्थायी रूप में निवास करनेवाले अधिकांश प्रवासी भारतीय, जो भारत के अनेक प्रांतों और क्षेत्रों से संबंधित हैं, हिंदी-उर्दू (जिसे सामान्यतः हिंदुस्तानी भी कहा जा सकता है) भाषाओं के माध्यम से आपस में एक-दूसरे के साथ जुड़े रहते हैं। पूरी दुनिया में फैला हुआ वृहत्तर प्रवासी भारतीय समाज का अधिकांश हिंदी-उर्दू को अपनी अस्मिता से जुड़ने का ज़रिया मानता है। कहा जा सकता है कि हिंदी-उर्दू : प्रवासी भारतीयों के सांस्कृतिक जुड़ाव और उनकी वैश्विक पहचान का माध्यम हैं! यह विचार अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग के प्रोफेसर शंभुनाथ तिवारी ने सिडनी (आस्ट्रेलिया) के स्थानीय एफएम रेडियो चैनल ‘दर्पण’ द्वारा आयोजित बातचीत ( साक्षात्कार) में व्यक्त किए। वह सिडनी(आस्ट्रेलिया) में बसे हुए हिंदी-उर्दू भाषा-भाषी भारतीय डायसपोरा को संबोधित करने के हवाले से उक्त रेडियो के साक्षात्कार कार्यक्रम का हिस्सा थे। विचारणीय है, सिडनी सहित आस्ट्रेलिया के कमोबेश सभी प्रमुख शहरों (जिनसे भारत का वृहत्तर क्रिकेट प्रेमी समाज परिचित है) में भारतीय प्रवासियों का एक बड़ा समाज है, जो हिंदी-उर्दू की मजबूत हिंदुस्तानी पहचान के साथ उसी भाषायी डोर से अपने वतन हिंदुस्तान की अपनी जड़ों से भी बहुत गहराई के साथ जुड़ा रहता है। बातचीत में प्रो. शंभुनाथ तिवारी ने कहा कि जीवन की महत्वाकांक्षाओं एवं घर-परिवार की अपेक्षाओं के कारण मन में रोज़ी-रोटी की आस लिए अपने वतन से दूर, पर अपनों के दिलों के बहुत क़रीब प्रवासी भारतीय किसी सुदूर देश के अनजान शहर में जाकर बस जाते हैं। उनकी यह विवशता है कि अनेक कारणों से वे चाहकर भी स्वदेश लौट नहीं सकते। इसलिए प्रवासी की पीड़ा और स्वदेश की स्मृतियों को साथ (हमको रोटी ने घर से दूर किया / वक़्त कितना बड़ा कसाई है) लिए दुनिया के अलग-अलग देशों में जाकर अपनी एक नई दुनिया बना लेते हैं, एक नए समाज का निर्माण कर लेते हैं। बावजूद इसके अपनी ज़मीन, अपनी संस्कृति से जुड़े ( कितनी चिड़िया जुड़े आकाश/ दाना है धरती के पास) भी रहते हैं। अधिकांश प्रवासी भारतीयों की भाषा हिंदी-उर्दू है, जो उन्हें अपनी सांस्कृतिक जड़ों से जोड़कर उनकी वैश्विक पहचान बनाती हैं। प्रो. तिवारी ने कहा कि हिंदी -उर्दू का यह सामंजस्य सिडनी जैसे आस्ट्रेलियी शहरों में न केवल प्रवासी भारतीयों को आपस में जुड़ने का अवसर देता है, बल्कि जिस तरह भारत-आस्ट्रेलिया राजनीतिक-व्यापारिक-सामाजिक और भावनात्मक स्तर पर एक-दूसरे के समीप आ रहे हैं, ऐसे में आस्ट्रेलिया के प्रवासी भारतीयों के साथ जुड़ने में इन भाषाओं की महत्वपूर्ण भूमिका हो सकती है। इस क्रम में आस्ट्रेलिया के प्रवासी भारतीयों के लिए हिंदी -उर्दू की बढ़ती हुई वैश्विक पहचान और भारत-आस्ट्रेलिया के बढ़ते व्यापारिक रिश्तों के साथ -साथ दोनों देशों के सामाजिक और सांस्कृतिक संबंधों के मध्य हिंदी-उर्दू के ज़रिए एक मजबूत भाषायी सेतु बनाया जा सकता है।
